Thursday, 19 April 2018

नोटबंदी से लेकर नोटमंदी तक, केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक में जारी है मतभेद?

देश में नोटबंदी के झटके के बाद करेंसी संचार को लेकर आम आदमी को दूसरा झटका लगा है. इस झटके में जहां 6 से 7 राज्यों में एटीएम खाली हो गए और देशभर में एटीएम से कैश निकालने की होड़ लग गई वहीं एक बार फिर वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बयानों से आपसी तालमेल की झलक दिखने लगी.

बुधवार को जैसे ही सोशल मीडिया में करेंसी क्रंच का कीवर्ड ट्रेंड करने लगा आनन फानन में वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक, सरकारी बैंक और आर्थिक सलाहकारों समेत कई स्तर से मामले पर सफाई का दौर शुरू हो गया. केंद्र सरकार की तरफ से पहले वित्त मंत्रालय से सफाई दी गई कि करेंसी का कोई संकट नहीं है. लेकिन जिन इलाकों में इस संकट का दावा किया जा रहा है वहां जल्द से जल्द राहत पहुंचाने का काम किया जा रहा है.

गौरतलब है कि वित्त राज्य मंत्री की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस तक कई राज्यों में अप्रत्याशित कैश निकासी का जिक्र नहीं किया गया. इस निकासी का जिक्र दोपहर बाद तब हुआ जब एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार ने दावा किया कि जहां आमतौर पर एक महीने के दौरान देश में 20,000 करोड़ रुपये की निकासी बैंकिंग से की जाती है, महज अप्रैल के पहले दो हफ्तों के दौरान कुल 45,000 करोड़ रुपये की निकासी हो चुकी है. इसके चलते कुछ राज्यों में एटीएम खाली हो गए हैं हालांकि दावा किया गया कि सरकार जल्द से जल्द स्थिति को सामान्य कर लेगी.

खास बात है कि इन सभी संवादों के बीच एक बात बार-बार कही गई कि देश के सरकारी खजाने में पर्याप्त मात्रा में करेंसी उपलब्ध है. इसके बावजूद बुधवार दोपहर बाद केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया कि उसने रिजर्व बैंक को जल्द से जल्द 500 रुपये की मुद्रा की प्रिंटिंग शुरू करने का निर्देश दे दिया है. सवाल खड़ा होता है कि जब दोपहर तक सरकार और केंद्रीय बैंक के आकलन में पर्याप्त मात्रा में करेंसी उपलब्ध थी फिर क्यों तेज रफ्तार से करेंसी की प्रिंटिंग का फरमान दिया गया?

क्या एक बार फिर नोटबंदी के दौर की तरह इस करेंसी क्रंच के समय वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच संवाद में कोई कमी थी या फिर दोनों ही संस्थाएं एक ही मसले को सुलझाने की कोशिश एकांत में कर रहे थे? यदि ऐसा है तो क्या वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक में ऐसी संवादहीनता इन संस्थाओं को किसी छोटे-बड़े आर्थिक संकट से निपटने में कमजोर नहीं कर रही है?


Source:-Aajtak

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